Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 23, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
गेहान्तरेव प्रादेशमात्रमारुह्य संविदा ।
बभूवतुश्चिदाकाशरूपिण्यौ व्योमगाकृती ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
वह दूर आकाश में गमन की कल्पना अपने घर के मण्डप के वित्तेभर आकाश में ही हुई न
कि बाहर, ऐसा कहते हैं।
सचमुच वे दोनों बहुत दूर गई सो बात नहीं है, किन्तु उन्होंने उद्बुद्ध हुए पूर्वसंकल्प-
संस्कार-ज्ञान से बिलस्तभर गृहाकाश में ही चढ़कर सर्वगामी ज्ञान में आरोहण और
आकाशगमन के अनुरूप चिदाकाशमूर्ति का अवलम्बन किया (२)