Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 23, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
दृश्यानुसन्धाननिजस्वभावादाकाशदेहे अपि ते मिथोऽत्र ।
परस्पराकारविलोकनेन बभूवतुः स्नेहपरे वयस्ये ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
चिदाकाश देह की प्राप्ति होने पर भी चित्त में स्थित पूर्व संकल्पित दृश्य के अनुसन्धान
की अनुपपत्ति होती है । उक्त समाधिकाल में वे दोनों संकल्प-संस्कारोंसे पूर्ण चित्त के साथ
एकी भाव को प्राप्त हो गई थी, इस कारण से वे पूर्वसंकल्पित दृश्य का दर्शन कर तृप्त हो ग
इसी को दूसरे प्रकार से कहते हैँ ।
समाधि अवस्था में आकाश देहयुक्त भी वे दोनों ललनाएँ पूर्वसंकल्पित दृश्य के अनुसन्धान
से युक्त चित्तस्वरूपता को प्राप्त अपने स्वभाव से परस्पर अपने आकार के दर्शन स्नेहपूर्ण
सखियाँ हुई