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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 24, Verse 65

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 24, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 65

संस्कृत श्लोक

उदुम्बरोदरमशकक्रमभ्रमज्जगत्त्रयान्तरगतभूतसंचयम् । विलङ्घ्य तद्वरललने खमुच्चकैर्महीतलं पुनरपि गन्तुमुद्यते ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आकाश का वर्णन करने पर लोगों को आकाशचारियों के वैभव में राग न हो, इसलिए उन्हें तुच्छ करते हुए कहते है । वे दोनों ललनाएँ जिसमें गूलर के फल के अन्दर के छोटे छोटे मशकों की नाई त्रिजगत्‌- मध्यवर्ती प्राणिवर्ग घूम रहा था, एसे आकाश को ऊपर तक लाँघकर फिर पृथ्वीतल में जाने के लिए उद्यत हुई