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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 26, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 26, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

असदेवाङ्ग सदिव भाति पृथ्व्यादिवेदनात् । यथा बालस्य वेतालो नाभाति तदवेदनात् ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बालक को भ्रम से पुरुष का ज्ञान न होने से, वेताल प्रतीत होता है, वैसे ही भ्रमवश पृथिवी आदि का ज्ञान होने से असत्‌ ही पृथिवी आदि सत्‌ से प्रतीत होते हैं (& )