Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 27, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
लीलोवाच ।
इहैव मन्दिराकाशे पतिर्विप्रो ममाभवत् ।
इहैव स मृतो भूत्वा संपन्नो वसुधाधिपः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
यों प्रत्यक्ष दर्शन और उपदेश द्वारा सरस्वती देवीसे निर्दिष्ट अर्थ में लीला की असंभावना
की शंका निवृत्त हो गई, अतएव वह मण्डपाकाश के अन्दर ही अपने पति के दोनों परलोकों
की तथा हजारों ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति का अनुवाद करती हुई फिर अपने पति के मण्डल को
दिखलाने की प्रार्थना करती है ।
लीला ने कहा : देवि, इसी मन्दिर के आकाश में मेरे पतिदेव ब्राह्मण हुए, इसी में मरे और
फिर इरी में उत्पन्न होकर राजा हुए