Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verses 24–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 27, verses 24–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ।
इत्यनर्थमहारज्वा वलितो वशतां गतः ॥ २४ ॥
तत्कस्य वद भर्तुस्त्वां समीपं वरवर्णिनि ।
वात्या वनान्तरं गन्धलेखामिव वनान्नये ॥ २५ ॥
अन्य एव हि संसारः सोऽन्यो ब्रह्माण्डमण्डपः ।
अन्या एव तता वत्से व्यवहारपरम्पराः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
अनेकानेक कठिनतर राजकार्यो को करता
हुआ भी वह इस संसाररूपी भ्रम में सोया पड़ा है, जड होने के कारण जागता नहीं है ॥२ ३॥ मैं
राजा हूँ, मैं भाँति भाँति के भोगों का भोक्ता हू, मैं सिद्ध हूँ, बलवान् हूँ, सुखी हूँ, इस प्रकार की
अज्ञानरूप बड़ी रस्सी से वेष्टित होकर अस्वतन्त्रता को प्राप्त हो गया है । हे सुन्दरी, कहो,
तुम्हें उन तीनों में से, जैसे आँधी सुगन्धपरम्परा को एक वन से दूसरे वन में ले जाती है, वैसे
ही किस पति के समीप ले जाऊँ ?