Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 27, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
यथा तरङ्गः सरसि भूत्वा भूत्वा पुनर्भवेत् ।
विचित्राकारकालाङ्गदेशाज्ञप्तावलं तथा ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तालाब में लहरें हो होकर पुनः होती हैं, वैसे ही विचित्र आकारवाले
काल, काल के अवयव दिन, रात्रि आदि, ब्रह्माण्ड एवं उनके अवयव भुवन आदि देश महाचिति
में हो होकर पुन: होते हैं