Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verses 35–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 29, verses 35–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 35-38
संस्कृत श्लोक
अत्रासौ भर्तृजीवो मे स्थितो व्योम्नि गृहे नृपः ।
अदृश्यः खे यथा वायुरामोदो वानिले यथा ॥ ३५ ॥
इहैवाङ्गुष्ठमात्रान्ते तद्व्योम्न्येव पदं स्थितम् ।
मद्भर्तृराज्यं समवगतं योजनकोटिभाक् ॥ ३६ ॥
आवां खमेव स्वस्थं च भर्तृराज्यं ममेश्वरि ।
पूर्णं सहस्रैः शैलानां महामायेयमातता ॥ ३७ ॥
तद्देवि भर्तृनगरं पूनर्गन्तुं ममेप्सितम् ।
तदेहि तत्र गच्छावः किं दूरं व्यवसायिनाम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आकाश में वायु
अदृश्य होकर रहता है और जैसे वायु में सुगन्धि अदृश्य होकर रहती है वैसे ही इस घर के
आकाश में यह मेरे पति का जीव राजा रहता है । यहीं अंगुष्ठमात्र गृहाकाश में ही स्थित परमार्थ
वस्तु (परब्रह्म) को भ्रम से मैंने करोड़ों योजन विस्तृत मेरे पति का राज्य समझा । हे देवी, हम
दोनों चिदाकाश ही हैं,मेरे पतिदेव का राज्य जो कि हजारों पहाड़ों से पूर्ण है, आकाश में स्थित
है, यह बहुत बड़ी माया फैली हुई है । हे देवी पति के नगर में पुनः जाने की मेरी इच्छा है,
इसलिए आइये वहाँ चले | उद्योगियों के लिए क्या दूर है ?