Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 29, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
लीलोवाच ।
तद्देवि भास्करादीनां क्वाधस्तेजो गतं वद ।
शिलाजठरनिष्पन्दं मुष्टिग्राह्यं तमः कुतः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
लीला ने कहा : हे
देवि, सूर्य आदि का तेज नीचे कहाँ चला गया, पत्थर के मध्यभागके समान निबिड अतएव
मुट्ठी में लेने योग्य यह अन्धकार कहाँ से आ गया है ? कृपया यह मुझसे किये