Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verses 54–60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 29, verses 54–60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 54-60
संस्कृत श्लोक
अक्लेशेनैव ते तस्मान्निर्गते गगनादिव ।
निश्चयस्थं हि यद्वस्तु तद्वज्रगुरु नेतरत् ॥ ५४ ॥
निरावरणविज्ञाना सा ददर्श ततस्ततम् ।
जलाद्यावरणं पारे ब्रह्माण्डस्यातिभासुरम् ॥ ५५ ॥
ब्रह्माण्डाद्दशगुणतस्तोयं तत्र व्यवस्थितम् ।
आस्थितं वेष्टयित्वा तु त्वगिवाक्षोटपृष्ठगा ॥ ५६ ॥
तस्माद्दशगुणो वह्निस्तस्माद्दशगुणोऽनिलः ।
ततो दशगुणं व्योम ततः परममम्बरम् ॥ ५७ ॥
तस्मिन्परमके व्योम्नि मध्याद्यन्तविकल्पनाः ।
न काश्चन समुद्यन्ति वन्ध्यापुत्रकथा इव ॥ ५८ ॥
केवलं विततं शान्तं तदनादि गतभ्रमम् ।
आद्यन्तमध्यरहितं महत्यात्मनि तिष्ठति ॥ ५९ ॥
आकल्पमुत्तमबलेन शिला पतेच्चेत्तस्मिन्बलात्पतगराडपि चोत्पतेच्चेत् ।
तद्योजनं न लभते विमलेऽम्बरेऽन्तर्माकल्पमेकजवगोऽप्यथ मारुतोऽपि ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
वे वहाँ से, जैसे कोई आकाश से निकले वैसे ही अनायास निकली |
जो वस्तु सत्यता के अध्यवसायमें स्थित हो यानी यह वस्तु सत्य है ऐसे अध्यवसाय से युक्त
हो, वह वज के समान ठोस होती है और जो उक्त अध्यवसाय से युक्त नहीं है वह मिथ्यात्वबुद्धि
से बाधित हो जाती है । लीला का विज्ञान आवरणशून्य था, अतएव उसने ब्रह्माण्डसंपुटके
ऊपरवाले कपाल के बाद ब्रह्माण्ड के आर पार अत्यन्त भाखर जलादि आवरण को व्याप्त
देखा । ब्रह्माण्ड से दस गुना जल वहाँ पर है, वह जैसे अखरोट के ऊपर उसका बाहरी छिलका
उसे व्याप्त करके रहता है, वैसे ही ब्रह्माण्ड को व्याप्त करके स्थित है । उसके बाद उससे
दसगुनी अग्नि है, उसके बाद उससे दसगुना वायु था, उसके अनन्तर उससे दसगुना आकाश
है तदनन्तर शुद्ध चिदाकाश है । उस परमाकाश में वन्ध्यापुत्र के वृत्तान्तो की नाई, आदि,
मध्य ओर अन्त की कल्पनाएँ कुछ भी उदित नहीं होती यानी वह अपरिच्छिन्न है । वह अद्वितीय,
असीम, शान्त, कारण रहित, भ्रमशून्य, आदि अन्त ओर मध्यरहित है एवं अपनी महिमा में
स्थित हे । यदि उस निर्मल चिदाकाश में कल्पपर्यन्त बड़े भारी वेग से ऊपर से पत्थर नीचे को
गिरे ओर नीचे से गरुड ऊपर को बड़े वेग से कल्पपर्यन्त उड़े और उनके बीच में उनका
सन्धान करने में समर्थ वायु एक वेग से दाएँ-बाएँ दोनों ओर से बहे, तो वह भी उनसे मिल नहीं
सकता फिर चारों ओर से उसके अन्त पाने की तो बात ही क्या है ? वह चारों ओर से असीम
ओर अपरिच्छिन्न हे