Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verses 13–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3, verses 13–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 13-21
संस्कृत श्लोक
निर्वाणमात्रं पुरुषः परो बोधः स एव च ।
चित्तमात्रं तदेवास्ते नायाति वसुधादिताम् ॥ १३ ॥
सर्वेषां भूतजातानां संसारव्यवहारिणाम् ।
प्रथमोऽसौ प्रतिस्पन्दश्चित्तदेहः स्वतोदयः ॥ १४ ॥
अस्मात्पूर्वात्प्रतिस्पन्दादनन्यैतत्स्वरूपिणी ।
इयं प्रविसृता सृष्टिः स्पन्दसृष्टिरिवानिलात् ॥ १५ ॥
प्रतिभानाकृतेरस्मात्प्रतिभामात्ररूपधृक् ।
विभात्येवमयं सर्गः सत्यानुभववान्स्थितः ॥ १६ ॥
दृष्टान्तोऽत्र भवत्स्वप्नपुरस्त्रीसुरतं यथा ।
असदप्यर्थसंपत्त्या सत्यानुभवभासुरम् ॥ १७ ॥
अपृथ्व्यादिमयो भाति व्योमाकृतिरदेहकः ।
सदेह इव भूतेशः स्वात्मभूः पुरुषाकृतिः ॥ १८ ॥
संवित्सकल्परूपत्वान्नोदेति समुदेति च ।
स्वायत्तत्वात्स्वभावस्य नोदेति न च शाम्यति ॥ १९ ॥
ब्रह्मा संकल्पपुरुषः पृथ्व्यादिरहिताकृतिः ।
केवलं चित्तमात्रात्मा कारणं त्रिजगत्स्थितेः ॥ २० ॥
संकल्प एष कचति यथा नाम स्वयंभुवः ।
व्योमात्मैष तथा भाति भवत्संकल्पशैलवत् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यों जगत् की ब्रह्ममात्रता सिद्ध हुई, यह भाव है। इससे जीवकी भी ब्रह्ममात्रता सिद्ध हुई,
यह कहते हैं।
चूँकि चित्तोपाधि जीव चित्तभ्रान्ति से चित्तमात्र होकर भी परमार्थरूप से निर्वाणमात्र
परमबोधरूप चिदाकाश ही है, इसलिए वह भौतिक पुरुषता को प्राप्त नहीं होता संकल्प
शरीर यह ब्रह्मा संसारमें व्यवहार करनेवाले सम्पूर्ण भूतों में पहला प्रतिस्पन्द है, इसीसे ही
अहंभाव का उदय हुआ है। इस प्रथम प्रतिस्पन्द से अभिन्न स्वरूपवाली (इससे उत्पन्न स्थूल
प्रपंच के एतद्रूप होने से अभिन्न स्वरूपवाली) यह सृष्टि वायु से स्पन्द की सृष्टि की नाई फैली
हुई है। यह दृश्यमान सृष्टि प्रातिभासिक आकारवाले ब्रह्मा से उत्पन्न है, अत: प्रातिभासिकरूप
है, फिर भी लोगों की दृष्टि में सत्यरूप से प्रतीत होती है । अथवा परमार्थरूप से चिन्मात्र
आकारवाले ब्रह्मा से उत्पन्न चिन्मात्र आकारको धारण करती हुई भी यह सृष्टि जड़रूप से
प्रतीत होती है । असद् वस्तु जो सत्यरूप से प्रतीत होती है, उसमें दृष्टान्त है-स्वप्नके अन्दर
हुए दूसरे स्वप्न में स्त्रीका समागम । जैसे स्वप्न में स्त्रीसमागम का यदि स्वप्न देखा जाय,तो
उससे धातुपात होता है, वैसे ही व्यवहार और प्रयोजन की सिद्धि की दृष्टि से असत्य पदार्थमें
सत्यतुल्य व्यवहार हो सकता है । अतएव स्वप्न में स्त्रीसमागम-स्वप्न के सर्वथा असत्य होने
पर उससे जैसे सत्य के समान प्रयोजन निष्पन्न होता है, वैसे ही प्रतिभासमात्र आकारवाले
ब्रह्मा से उत्पन्न प्रतिभासरूपी यह सृष्टि भी सत्य के तुल्य प्रयोजन को सिद्ध करती हे ।
जिसका शरीर पृथिवी आदिमय नहीं है और जो चिदाकाशरूप एवं शरीर रहित है,वह भूतों का
अधिपति ब्रह्मा भ्रान्तिवश पुरुषाकृति एवं सदेह-सा प्रतीत होता है । ब्रह्माके दोरूप हैं-एक
संवित्-रूप जो कि पारमार्थिक है और दूसरा संकल्परूप जो भ्रान्ति से हे । यों संवित् ओर
संकल्परूप ब्रह्मा परमार्थरूप से उदित नहीं होता ओर भ्रान्ति से उदित होता है । स्वरूपस्थिति
जगत् की सत्ताके समान अविद्याके अधीन नहीं है, इसलिए न तो उसका उदय होता है और न
विनाश ही । संकल्पपुरुष पृथिवी से रहित आकारवाला केवल चित्तमात्रशरीर ब्रह्मा ही तीनों
जगतों की स्थिति का कारण हे । उक्त ब्रह्मा का यह संकल्प प्राणियों के कर्मो के अनुसार जिस
जिस प्रकार से विकास को प्राप्त होता है, जैसे कि आपका मन पर्वत के आकार को प्राप्त होता
है, वैसे ही यह चैतन्यात्मा उसी प्रकार से प्रतीत होता हे । भाव यह कि जब मन पर्वतभाव में
होता है, तब पर्वताकार प्रतीत होता है, वैसे ही ब्रह्मा का संकल्प प्राणियों के कर्मो के अनुसार
जब जिस प्रकार से विकसित होता है तब चिदात्मा वैसा प्रतीत होता है