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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

आधिभौतिकता नास्ति रज्ज्वामिव भुजङ्गता । ब्रह्मादयः प्रबुद्धास्तु कथं तिष्ठन्ति तत्र ते ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जगत्‌ के ही बाधित होने पर तत्त्वज्ञो को देह आदि में आधिभौतिकत्व की प्रतीति नहीं हो सकती, ऐसा कहते है । जैसे तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि में रस्सी में सर्पता नहीं हे, वैसे ही इस जगत्‌ में आधिभौतिकता नहीं है । फिर प्रबुद्ध वे ब्रह्मा आदि आधिभौतिक देह आदि में केसे रह सकते हैं ? अर्थात्‌ उनके आधिभौतिक देह आदि नहीं है, इसमें तो कहना ही क्या है ?