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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verses 13–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 30, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 13-15

संस्कृत श्लोक

वृक्षवल्मीकजालेन केषांचिद्धृदि भूतलम् । ससुरानरदैत्येन वेष्टितं व्योम निर्मलम् ॥ १३ ॥ संभूतं सह भूतेन सग्रामपुरपर्वतम् । इदं कल्पनभूतेन पक्वाक्षोटमिव त्वचा ॥ १४ ॥ यथा विन्ध्यवनाभोगे प्रस्फुरन्ति करेणवः । तथा तस्मिन्पराभोगे ब्रह्माण्डत्रसरेणवः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की शंका का समाधान कर प्रस्तुत ब्रह्माण्डों की विचित्रता का वर्णन करने के लिए भूमिका बोधिते है। किन्हीं ब्रह्माण्डों के अन्दर की भूमि वृक्षों ओर वामियों से व्याप्त है । उनमें मनुष्यों का नामनिशान नहीं है और निर्मल आकाश देवताओं, नरभिन्न और नरतुल किंपुरुषो और दैत्यों से आक्रान्त है जैसे पका हुआ अखरोट का फल त्वचा से (छाल से) वेष्टित रहता है वैसे ही कुछ ब्रह्माण्ड तुरन्त कल्पनात्मक चार प्रकार के प्राणियों के साथ ही ग्राम, नगर, पर्वतों से युक्त होकर उत्पन्न हुए हैं । जैसे विन्ध्याचल के विशाल वन में हाथी पैदा होते हैं, वैसे ही परमात्मा के मायाशबलस्थान में ब्रह्माण्डरूपी त्रसरेणु उत्पन्न होते हैं