Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 30, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 30, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
आचाराद्वेदशास्त्राणामाद्य एवान्यथोदिते ।
आरम्भोऽपि तथान्येषामनित्यः संस्थितः क्रमः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि “धाता यथा पूर्वमकल्पयत्“ (ब्रह्मा ने पूर्व सृष्टि के अनुसार ही
ब्रह्माण्डो की रचना की) यह श्रुति सम्पूर्ण स्रष्टियो की एकरूपता का वर्णन करती है, उससे
विरुद्ध सृष्टियों की विलक्षणता का प्रतिपादन कैसे करते है ? इस पर कहते है ।
उक्त श्रुति पूर्व कल्प में जैसी ब्रह्मा की सृष्टि थी वैसी ही दूसरी, तीसरी आदि सृष्टियाँ
होती हैं, ऐसा प्रतिपादन करती है । वेद-शास्त्रों से सम्बन्ध रखनेवाले पूर्व जन्म के कर्म-ज्ञान
के अनुष्ठानरूप सदाचार से ब्रह्मभाव को प्राप्त हुए ब्रह्मा का पहले की सृष्टि के अन्य
सृष्टिकर्ताओं की सृष्टि से विलक्षण रूप से उदित होने पर आगे के कल्पो की सृष्टियों का
आरम्भ भी पूर्व की नाई हो, लेकिन अन्य सृष्टिकर्ताओं का सृष्टि की अपेक्षा इसका क्रम
अनियत ही ठहरा । इस प्रकार सृष्टियों की विलक्षणता सिद्ध हुई