Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 31, Verses 24–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 31, verses 24–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
शास्त्रोक्ताचारयुक्तस्य प्रभोरर्थेन यो रणे ।
मृतो वाथ जयी वा स्यात्स शूरः शूरलोकभाक् ॥ २४ ॥
अन्यथा प्राणिकृत्ताङ्गो रणे यो मृतिमाप्नुयात् ।
डिम्भाहवहतः प्रोक्तः स नरो नरकास्पदम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने
कहा : वत्स, शास्त्रों में प्रतिपादित सदाचार से युक्त राजा के लिए रणभूमि में जो युद्ध करता
है, वह चाहे रण में मृत्यु को प्राप्त हो, चाहे विजयी हो, वह शूर है ओर शूरोचित लोक का
भाजन है । पूर्वोक्त विधि से विपरीत यानी असदाचारी राजा के लिए जिसने प्राणियों का
अंगच्छेदन किया है, वह यदि रण में मृत्यु को प्राप्त हो, तो वह डिम्भाहव में मारा गया कहलाता
है ओर वह नरकगामी होता हे