Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 34, Verses 12–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 34, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
आपादशृङ्खलाप्रोतभ्रमत्स्थूलोपलद्वयम् ।
भ्रामयंश्चित्रदण्डाख्यं चक्रमूर्ध्वभुजो जवात् ॥ १२ ॥
योधो यम इवाभाति याम्यादायाति दिक्तटात् ।
सर्वतः संहरन्सेनामेहि यामो यथागतम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
पैरों तक
लटकी हुई जंजीर में गूथ हुए दो बड़े बड़े पत्थरों से युक्त चित्र दण्डनामक चक्र को वेग से
घुमा रहा ऊपर को वाहू फैलाया हुआ यह योद्धा यम की नाई प्रतीत होता हे, दक्षिण दिशा
से चारों ओर सेना का संहार करता हुआ इधर आता है, अतः चलो, जहाँ से हम आये थे
वहीं चलें (यह डरपोक की डरपोक के प्रति उक्ति है)