Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 35, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ प्रोड्डयनोद्युक्ततुरङ्गमतरङ्गकः ।
उत्ताण्डव इवोन्मत्तो बभूव स रणार्णवः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले समुद्र के रूपक से संग्राम का वर्णन करने के लिए वस़्रिष्ठजी कहते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, मानों उड़ने के लिए तैयार घोड़े ही जिसमें
तरंग का रूप धारण किये हुए थे, ऐसा वह संग्रामरूपी सागर उद्धत ताण्डव नृत्य करनेवाले
उन्मत्त के तुल्य हुआ
सर्ग सन्दर्भ
चौंतीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतीसवाँ सर्ग॑ समुद्र, वन, प्रलय आदि विविधरूपकों से चतुरंगिणी सेना के संग्राम का विस्तार से वर्णन ।