Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 35, Verses 6–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 35, verses 6–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 6-8
संस्कृत श्लोक
मीनव्यूहविनिष्क्रान्तशरबीजौघसर्षपः ।
हेतिवीचीवरालूनपताकावीचिमण्डलः ॥ ६ ॥
शस्त्रवारिकृताम्भोदसदृशावर्तकुण्डलः ।
संरम्भघनसंचारसेनातिमितिमिङ्गिलः ॥ ७ ॥
कृष्णायसपरीधानवलत्सेनाम्बुभीषणः ।
कबन्धावर्तलेखान्तर्बद्धसैन्यादिभूषणः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सागर में मछलियों के समूहों से उत्पन्न हुए सर के (काश
के) बीजों के ढेर की नाई सरसों के आकार के सफेद अण्डे बिखरे रहते हैं, वैसे ही उक्त
संग्रामभूमि में मरे हुए लोगों के समूह से उन्हें छिन्न-भिन्न कर निकले हुए बाणरूपी सरसों
की छिमियाँ बिखरी थी, अस्त्र-शस्त्ररूपी प्रधान लहरों ने पताकारूपी छोटी लहरों के
मण्डल को छिन्न-भिन्न कर दिया था, तलवार आदि शस्त्र रूपी जलसे निर्मित मेघ के
समान अस्थिर आवर्त उक्त रणसागर के कुण्डल थे, मारे क्रोध के शीघ्र चलनेवाली सेना
ही उसमें तिमि और तिमिंगिल (& ) (महामत्स्य जाति) थे, वह रणसागर लोहमय कवचों
को धारण की हुई इधर-उधर चलती हुई सेनारूपी जल से भीषण था, कवचरूपी जल के
आवर्त की पंक्ति के मध्य में सैनिकों के भूषण प्रतिबिम्बित थे