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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 36, Verses 1–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 36, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 1-4

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ श्रृङ्गोपमानेषु स्थितेषु शरराशिषु । सर्वभीरुषु भग्नेषु विद्रुतेषु दिशो दश ॥ १ ॥ मातङ्गशवशैलेषु विश्रान्ताम्बुदपङ्कतिषु । यक्षरक्षःपिशाचेषु क्रीडत्सु रुधिरार्णवे ॥ २ ॥ महतां धर्मनिष्ठानां शीलौजःसत्त्वशालिनाम् । शुद्धानां कुलपद्मानां वीराणामनिवर्तिनाम् ॥ ३ ॥ द्वन्द्वयुद्धानि जातानि मेघानामिव गर्जताम् । मिथोनिगरणोत्कानि मिलन्त्यापगपूरवत् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, मेघपंक्तियाँ जिनमें विश्राम ले रही थी ऐसे हाथियों के शवरूपी पर्वतां मेँ अति उन्नत होने के कारण स्थित बाणराशियों के शिखरसदृश होने पर, घायल हुए सम्पूर्ण डरपोक योद्धाओं के दसों दिशाओं की ओर भागने पर, यक्ष, राक्षस और पिशाचों के रुधिर के समुद्रों में जलक्रीड़ा करने पर, गर्ज रहे मेघों की नाई सच्चरित्रता, तेजस्विता और बल से परिपूर्ण, धर्मनिष्ठ, शुद्ध, अपने कुल के कमलरूप यानी अपने यश आदि से कुल की प्रतिष्ठा बढ़ानेवाले और युद्ध में पीठ न दिखानेवाले महावीरों के ब्न्द्र युद्ध हुए । वे इन्द्र युद्धों के कर्ता वीरगण नदियों के प्रवाहों के समान परस्पर मिलते थे

सर्ग सन्दर्भ

पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त छत्तीसवाँ सर्ग समान अस्त्र-शस्त्रों से द्वन्द्रयुद्ध और पूर्व आदि देशों के साथ उन देशों के अधिपतिरूप सहायकों का वर्णन ।