Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 37, Verses 40–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 37, verses 40–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 40,41
संस्कृत श्लोक
मित्रगर्तास्त्रिगर्तात्ता भ्रमित्वोर्ध्वं तृणोपमम् ।
विविशुर्व्यस्तमूर्धानः पातालान्तं पलायितुम् ॥ ४० ॥
मन्दानिलचलाम्भोधिभासुरे मागधे बले ।
निर्मग्ना वनिला मन्दाः पङ्के जीर्णगजा इव ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
त्रिगर्तदेश के योद्धाओं से पकड़े गये मित्रगर्तदेशीय योद्धा तिनके की नाई ऊपर को
घूमकर नीचे मस्तक हो भागने के लिए पाताल के अन्तस्तल में प्रविष्ट हुए मन्दगति
वनिलदेशीय वीर मन्दवायु से अस्थिर हुए महासागर के तुल्य स्फूर्तिमान् मगधदेश की सेना में
ऐसे नि:शेषरूप से मग्न हो गये जैसे कि कीचड़ में बूढ़े हाथी मग्न हो जाते हैं