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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 38, Verses 1–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 38, verses 1–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 1-7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवमत्याकुले युद्धे सास्फोटभयसंकुले । आदित्ये तमसा वृद्धे चटत्कठिनकङ्कटे ॥ १ ॥ वहत्यम्बूत्पतन्तीषु पतन्तीष्वश्मवृष्टिषु । नदीषु क्षेपणाच्छासु वरकेष्वब्जपङ्क्तिषु ॥ २ ॥ मिथः फलाग्रकाटोत्थवह्निसीकरिणीषु च । आयान्तीषु प्रयान्तीषु दूरं शरनदीषु च ॥ ३ ॥ वहल्लूनशिरःपद्मचक्रावर्तैस्तरङ्गितैः । खार्णवे पूरिते हेतिवृन्दमन्दाकिनीगणैः ॥ ४ ॥ समीरणरणत्क्वाणशस्त्रपूर्णघनैर्घनैः । संदेहान्तेषु सिद्धेषु कपिकच्छव्यथाप्रदैः ॥ ५ ॥ अष्टभागदशाशेषप्रतापमधुराकृति । शस्त्रघातौजसा वीर इवाहस्तनुतां ययौ ॥ ६ ॥ श्रान्ताश्वेभाः प्रभग्नाश्च हेतिसंघातदीप्तयः । दिवसेन समं सेना ययुर्मन्दप्रतापताम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, भुजास्फोट करने वाले विजयी वीरो से पराजित योद्धाओं के त्रास से परिपूर्ण अतिभीषण संग्राम में अन्धकार के आगमन से सूर्य भगवान्‌ के वृद्ध होने पर, शरीर के घावों से रुधिर प्रवाह को रोकनेवाले कठिन लौह कवचो के रुधिरक्लेद को बहाने पर, पत्थर रूपी ओलों से स्वच्छ पाषाणवृष्टि के एक पक्ष में ऊपर जाने और दूसरे पक्ष में नीचे गिरने पर, नदियों में कमलपंक्तियों के संकुचित होने पर, परस्पर फलके (बाण की नोक में लगे हुए लोहे के टुकड़े के) अग्रभाग में हुए आघात से उत्पन्न अग्नि कणरूपी सीकरों को (जलकणों को) धारण करनेवाली बाणनदियों के समीप में ओर दूर जाने पर, आयुधो की राशिरूपी मन्दाकिनियोंसे, जिनमें कटे हुए सिररूपी पद्म बह रहे थे, जो चक्ररूपी आवर्तो से पूर्णं ओर तरंगयुक्त थी, आकाशरूपी सागरके भर जाने पर, वायु के समान शब्द कर रहे शस्त्रो से परिपूर्णं होने के कारण अत्यन्त निबिड बैठने की जगह की लालिमा को बढाने के कारण वर्षा ऋतु के आरम्भ के सन्देह से वानरो को काम पीड़ा देनेवाले मेघो से सिद्धो को प्रलय का सन्देह होने पर, आठवें भागरूप अवस्था में हुई लालकान्ति से वीर की नाई तनुता (क्षीणता) को प्राप्त हुआ । सेनाएँ, जिनके घोड़े और हाथी थक गये थे और हथियारों की कान्ति क्षीण हो गई थी, दिन के साथ ही मन्दप्रतापवाली हो गई यानी जैसे दिन का प्रताप मन्द हुआ वैसे ही सेनाओं का प्रताप भी मन्द पड़ गया

सर्ग सन्दर्भ

सैंतीसवाँ सर्ग समाप्त अड़तीसवाँ सर्ग सायंकाल मेँ दोनों सेनाओं के युद्ध से निवृत्त होने पर भूत-प्रेतों से भीषण ओर बीभत्स रणभूमि का विस्तार से वर्णन ।