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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verses 21–25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verses 21–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 21-25

संस्कृत श्लोक

वसति त्रसरेण्वन्तर्ध्रियते गगनोदरे । लीयतेऽङ्कुरकोशेषु रसीभवति पल्लवे ॥ २१ ॥ उल्लसत्यम्बुवीचित्वे प्रनृत्यति शिलोदरे । प्रवर्षत्यम्बुदो भूत्वा शिलीभूयावतिष्ठते ॥ २२ ॥ यथेच्छमम्बरे याति जठरेऽपि च भूभृताम् । अनन्तराकाशवपुर्धत्तेऽथ परमाणुताम् ॥ २३ ॥ देहस्यान्तर्बहिरपि दधद्वनतनूरुहम् ॥ २४ ॥ भवत्याकाशमाधत्ते कोटीः पद्मजसद्मनाम् । अनन्याः स्वात्मनोऽम्भोधिरावर्तरचना इव ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

निष्कर्ष यह कि स्थूल शरीर बाह्य वस्तुओं का अनुसरण करता है, अतः उसका निरोध होने पर भी संवेदनेच्छामात्र के अनुसारी चित्तशरीर का निरोध नहीं हो सकता सब पदार्थों में उसका आविभार्व प्राप्त ही है, यह जो कहा था, उसीका विस्तार से प्रतिपादन करते हैं । चित्तशरीर त्रसरेणु के भीतर प्रविष्ट हो जाता है, आकाश के मध्य में स्थित होता है, अंकुर के कोष में लीन हो जाता है और पल्लव में रस बन जाता है । जलवीचियों में (लहरों मेँ) उल्लास करता है और शिलाओं के मध्य में नाचता है मेघ बन कर जल बरसाता है, शिला बन कर एक जगह स्थिर होता है, जब इच्छा होती है तब आकाश में जाता है, पर्वतों के अन्दर स्थित होता है, जिसमें तनिक अवकाश नहीं है ऐसा परमाणु बन जाता है, वह रूप रंगों को धारण कर रहा पर्वत बन जाता है ऐसा पर्वत कि जो पृथिवी को धारण करता है, दृढमूल है ओर आकाशचुम्बी है, ऐसा पर्वत केवल बाहर ही नहीं होता, किन्तु देह के अन्दर भी होता है (५६) कभी आकाश बन जाता है, कभी जैसे समुद्र अपने से अभिन्न आवर्त (पानी का भँवर) रचनाओं को धारण करता है, वैसे ही यह चित्तशरीर अपने स्वरूप से अभिन्न करोड ब्रह्माण्डों को चारों ओर धारण करता हे