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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verses 29–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verses 29–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 29,30

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच प्रत्येकमेव यच्चित्तं तदेवंरूपशक्तिकम् । पृथक्प्रत्येकमुदितः प्रतिचित्तं जगद्भ्रमः ॥ २९ ॥ क्षणकल्पजगत्संघा समुद्यन्ति गलन्ति च । निमेषात्कस्यचित्कल्पात्कस्यचिच्च क्रमं श्रृणु ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त पक्षों से प्रथम पक्ष का ही अगीकार कर श्रीवस्रिष्ठजी उत्तर देते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, हर एक का जो चित्त है वह इस प्रकार की शक्ति से सम्पन्न है, प्रत्येक चित्त में जगत्‌ का भ्रम पृथक्‌ पृथक्‌ रूप से उदित हुआ है। क्षण के तुल्य अनेक जगत्‌ किसी की दृष्टि में निमेष भर में उत्पन्न होते हैं और विनष्ट होते हैं और किसी की दृष्टि में कल्प से उत्पन्न और विनष्ट होते हैं इसमें आप क्रम सुनिये