Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
महाप्रलयरात्र्यन्ते चिरादात्ममनोवपुः ।
यथेदं तनुते तद्वत्प्रत्येकं मृत्यनन्तरम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
महाप्रलयरूप रात्रि का अवसान होने पर जैसे समष्टिचित्तशरीर
म् देह के अन्दर पर्वतभाव आदि स्वप्न में प्रसिद्ध ही है, इन्द्रजाल आदि में बाहर भी चित्त शरीर
का पर्वतभाव देखा जाता है ।
हिरण्यगर्भ समष्टिभोग्यप्रपच का विस्तार करते हैं, वैसे ही व्यष्टिचित्त शरीर प्रत्येक जीव भी
मृत्यु के अनन्तर अपने-अपने भोग्य स्वप्नादि व्यष्टि-प्रपंच का विस्तार करता है यानी
अनुभव करता है