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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 40, Verses 62–63

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 40, verses 62–63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

तस्माल्लीलासरस्वत्यावाकाशवपुषौ स्थिते । सर्वगे परमात्माच्छे सर्वत्राप्रतिघेऽनघे ॥ ६२ ॥ यत्र यत्र सदा व्योम्नि यथाकामं यथेप्सितम् । उदयं कुरुतस्तेन तद्गेहेऽस्ति गतिस्तयोः ॥ ६३ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त का उपसंहार कर उसका प्रकृत में सम्बन्ध जोड़ते हैं । इससे यह निश्चित हुआ कि लीला ओर सरस्वती देवी का शरीर आकाशवत्‌ सूक्ष्म था अतएव सर्वत्र जा सकती थी । उनके अत्यन्त सूक्ष्म छेद में भी प्रवेश करने में कोई रोकटोक नहीं हो सकती थी, वे दोनों निष्पाप और परमात्मा के तुल्य विशुद्ध थी