Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 42, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तेन स्वप्नपुरे द्रष्टा यान्वेत्ति पुरवासिनः ।
नरानिति नरा एव क्षणात्तस्य भवन्ति ते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत में जैसे शास्त्रीय अर्थक्रिया के योग्य वह आविर्धूत हुआ, किन्तु स्वप्नमें वैसे अर्थक्रिया
के योग्य आविर्भूत नहीं हुआ, यह अवान्तर विशेष होने पर भी उसके सद्रूप में कोड विशेष नहीं
है, ऐसा कहते हैं।
इस कारण द्रष्टा स्वप्नपुर में जिन पुरवासियों को नर रूप से जानता है, वे तुरन्त ही
उसके नर ही हो जाते हैं