Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 42, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
सर्वत्र विद्यते सर्वं देहस्यान्तर्बहिस्तथा ।
यत्तु वेत्ति यथा संवित्तत्तथा स्वैव पश्यति ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
संवित् सम्पूर्ण यानी स्वप्न और जाग्रत् देश और काल की पूरक होने से सत्य है और
मायाशक्ति से सर्वत्र सर्वपदार्थरूप से स्फुरण सामर्थ्य भी उसमें है, ऐसा कहते हैं।
सब वस्तु देह के अन्दर और सर्वत्र विद्यमान है संवित् जैसा जानती है, वह वैसे अपने को
ही देखती है