Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 42, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्नमृतिर्जन्तोरसत्या सत्यरूपिणी ।
अर्थक्रियाकरी भाति तथा मूढधियां जगत् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे प्राणियों की असत्य स्वप्नमृत्यु ही सत्यरूपिणी होकर अर्थक्रियाकारिणी शोक,
रोदन आदि अर्थक्रियाकारिणी होती हे वैसे मूढबुद्धियों को यह जगत शोक, मोह आदि देनेवाला
है