Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 42, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 42, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यथा नभसि मुक्तालीपिच्छकेशोण्ड्रकादयः ।
असत्याः सत्यतां याता भात्येवं दुर्दशां जगत् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे विकृतदृष्टिवालों को आकाश में मुक्तावली (मोतियों की
माला), मोर पंख से और कुण्डलाकार केशों का गोला आदि असत्य होते हुए भी सत्य से
प्रतीत होते हैं, वैसे ही अज्ञानियों को यह जगत् असत्य होता हुआ भी सत्य-सा प्रतीत होता
है