Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 43, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
हा मत्तमरुदूर्ध्वस्थानङ्गार गृहपादपान् ।
रणत्खरखरं नीरजालामातपपन्थिनः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
उनमें से किसीने किसीको सम्बोधन कर
कहा : खेद है, अधिक रस होने से (जलाधिक्य से) हरे-भरे अतएव सन्ताप को दूर
करनेवाले ऊँची जगह के हमारे घररूप वृक्षों को या हमारे घर के समीप के वृक्षों को उखाड़
फेंकने के लिए विपत्तिरूप प्रचण्डवायु रण से खडखड शब्द के साथ आई