Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 43, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 43, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
आलानत्वरुषेवैता दन्तिभिर्वृक्षपङ्क्तयः ।
स्फुरत्कटकटारावं पात्यन्ते कृतचीत्कृतैः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
अग्नि की ज्वालाएँ
ऊँचे-ऊँचे महलों के शिखरों में स्थित बड़े-बड़े मेघों को धुआँ-सा बना रही हैं, नगरी में
सजल तालाब, बावड़ी और उद्यान आदि रागियों के हृदय की नाई सूख रहे हैं ॥३ ८॥ हाथी
चिंघाड़ते हुए इन वृक्षपंक्तियों को ये हमारे बन्धनस्तम्भ के सजातीय हैं, इस रोष से मानों
कटकट शब्द के साथ गिरा रहे हैं