Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 44, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
यादृगर्थं जगद्रूपं तत्रैवोदेति तत्क्षणात् ।
न देशकालदीर्घत्वं न वैचित्र्यं पदार्थजम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसा संस्कारात्मक जगत् स्वरूप चित्तमे ओर वितिमे है, वैसा ही वह उदित होता है।
भोगकर्ता के अदृष्ट से उद्बोधित (प्रेरित) मायासंवलित चित्शक्ति अघटित वस्तु को गढने
में समर्थ है, यह भाव है । ऐसी परिस्थिति मे देशकालकी स्वल्यता और विपुलताका विरोध भी
हट गया, ऐसा कहती है ।
देश ओर काल की अल्पता या विपुलता तथा विचित्रता पदार्थ जन्य नहीं है । यदि वह
पदार्थजन्य होती, तो पदार्थ के स्वभाव के विरुद्ध नहीं होती