Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 24–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 44, verses 24–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
तस्य तावद्वद कथं कीदृशी वापि सत्यता ।
अथवोत्तरकाले तु भङ्गुरत्वादवस्तु तत् ॥ २४ ॥
ईदृक्च सर्वमेवेदं तत्र का नास्तिताधिका ।
स्वप्ने जाग्रदसद्रूपा स्वप्नो जाग्रत्यसन्मयः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
भला बताओ तो सही जाग्रत पदार्थो की सत्यता कैसी ? उत्तरकाल में (जाग्रत् में) बाधित
होने से स्वप्न को यदि असत्य कहो तो जाग्रत में उक्त असत्यता समानरूप से विद्यमान हे,
क्योकि नाश ओर बाध होने पर वस्तु में कोई अन्तर नहीं आता ।
तात्पर्य यह कि स्वप्न पदार्थो का जाग्रत काल में बाध होता है, तो जाग्रत्-पदार्थोका
उत्तरकाल में नाश होता है, एक का नाश होता है ओर दूसरे का बाध होता है पर असत्यता में
को अन्तर नहीं है, इस आशय से कहते है ।
यदि यह कहो कि उत्तरकाल में (जाग्रत में) भंगुर (बाधित) होने से स्वप्न पदार्थ असत् है,
ऐसा तो यह सारा ही जाग्रत जगत् है, इसलिए इस जाग्रत् जगत् में अनास्तिता (सत्यता) क्या
अधिक है ? स्वप्न में जैसे जाग्रत् असत्रूप हे, वैसे ही जाग्रत् में स्वप्न भी असद्रूप है