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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 32–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 44, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 32-34

संस्कृत श्लोक

घने तमसि यक्षाभास्तम एव न यक्षकः । तस्माज्जन्ममृतिर्मोहो व्यामोहत्वमिदं ततम् ॥ ३२ ॥ सर्वं तत्समहाकल्पं शान्तौ यदवशिष्यते । नातः सत्यमिदं दृश्यं न चासत्यं कदाचन ॥ ३३ ॥ द्वयमेवैतदथवा ब्रह्म तत्रैव संभवात् । आकाशे परमाण्वन्तर्द्रव्यादेरणुकेऽपि च ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे घने अँधेरे में बालक को जो भूत की भ्रान्ति होती है, वह अन्धकार ही है, भूत नहीं हे, वैसे ही जन्म, मरण ओर मोहरूप यह जगत्‌ अज्ञान (आवरण ओर विक्षेप) ही है और उसीसे विस्तार को प्राप्त हुआ है । यह सब महाकल्प से अर्थात्‌ ब्रह्मज्ञान से सब पदार्थों के बाधरूप वैज्ञानिक प्रलय से बाध्य है । इस सबके शान्त होने पर जो अवशिष्ट रहता है, वही ब्रह्म हे । जगत्‌ ब्रह्म से पृथक्‌ अतिरिक्त सत्य नहीं है एवं ब्रह्मरूप होने के कारण अत्यन्त असत्य भी नहीं हे । भाव यह कि अधिष्ठानभूत ब्रह्म की सत्ता ही दृश्य के सत्य, असत्य आदि सम्पूर्ण पक्षों को रोकती हे । अथवा यह जगत्‌ सत्य और असत्य दो रूपवाला भी नहीं हो सकता, क्योकि एक वस्तु दो विरुद्ध रूपवाली नहीं हो सकती । उक्त तीनों विरुद्ध पक्षों में ब्रह्म का, विरोध के बिना, सम्भव होने से, यह जगत ब्रह्म ही है । आकाश में, परमाणु के मध्य में और द्रव्य आदि के अणु के अतिसूक्ष्म अन्तर्भाग में जहाँ-जहाँ जीवाणु स्थित होता है, वहाँ-वहाँ इस जगत को अपना शरीर जानता है