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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 9–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 44, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

धूमं वर्षद्भिरुन्नादैर्लेलिहानोग्रहेतिभिः । वह्निभिर्नः पुरं प्राप्तं परयोधैश्च भूरिभिः ॥ ९ ॥ परिवारैर्विलासिन्यो देव्य आहृत्य मूर्धजैः । आक्रन्दन्त्यो बलान्नीताः कुरर्य इव धीवरैः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

धुएँ की वृष्टि कर रही, तेज धक्‌-धक्‌ शब्द करनेवाली तथा साँप की नाई लपलपा रही ज्वालाओं से युक्त अग्नि ने तथा तलवारों को लिये हुए असंख्य शत्रुसैनिकों ने हमारे नगर में प्रवेश किया । उनके अत्याचार का कहाँ तक वर्णन करें जैसे धीवर रो रही चिल्ला रही कुररी को (एक प्रकार के मृग या पक्षी को) जबरदस्ती पकड़ कर ले जाता है, वैसे ही वे क्रूर शत्रुसैनिक विविध हावभावों से सम्पन्न रानियों को, जो रो रही और चिल्ला रही थी, जबरदस्ती घसीट ले गये हैं