Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 45, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 45, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीसरस्वत्युवाच ।
विदूरथस्ते भर्तैष तनुं त्यक्त्वा रणाङ्गणे ।
तदेवान्तःपुरं प्राप्य तादृगात्मा भविष्यति ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीसरस्वतीजी ने कहा : भद्रे, तुम्हारा पति यह विदूरथ रणभूमि में देह का त्याग कर उसी
अन्तःपुर में पहुँच कर राजा पद्मरूप होगा
सर्ग सन्दर्भ
चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त प्ैंतालीसवाँ सर्ग॑ लीला को दूसरे वररूप राजा पद्म की प्राप्ति तथा जीवों को अपने-अपने संकल्पो के अनुसार फल-प्राप्ति का वर्णन |