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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 49, Verses 24–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 49, verses 24–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 24-26

संस्कृत श्लोक

उदगुर्भूतलाद्व्योम्नो रूपिका ऊर्ध्वमूर्धजाः । निर्मग्नविकरालाक्ष्यश्चलच्छ्रोणिपयोधराः ॥ २४ ॥ उद्भिन्नयौवना वृद्धाः पीवराङ्ग्योऽथ जर्जराः । स्वरूपारूपजघना दुर्नाभ्यो विकसद्भगाः ॥ २५ ॥ नररक्तशिरोहस्ताः संध्याभ्रारुणगात्रिकाः । अर्धचर्वितमांसासृक्स्रवत्सृक्क्याकुलाननाः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

खड़े हुए केशवाली गड्ढे से घुरी हुई विकराल नेत्रवाली तथा चंचल कटिभाग ओर स्तनमण्डल से युक्त रूपिकाएँ (अनेक पूतनाएँ) भूतल ओर आकाश से उत्पन्न हुई । उनमें से किसी की जवानी उभरी हुई थी, कुछ बुढ़ियाँ थी, कुछ बड़ी मोटी थी ओर कुछ का शरीर जीर्ण-शीर्ण यानी कृश था, किन्हींके जघन अपने स्वरूप के अनुरूप थे ओर किन्हींके स्वरूप के अनुरूप नहीं थे, किन्हीकी नाभियाँ बड़ी घृणित थी, गुप्त अंग भी आवृत नहीं थे, कुछने अपने हाथों मेँ नररक्त से पूर्ण खप्पर ले रक्खा था, अतएव उनका शरीर सन्ध्याकाल के मेघ के समान लाल था, आधा चबाये हुए माँस ओर खून को बहा रहे ओठों के प्रान्तों से उनका मुँह व्याप्त था