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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, Verses 10–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 5, verses 10–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 10-13

संस्कृत श्लोक

यं यान्ति दृश्यवृन्दानि पयांसीव महार्णवम् । य आत्मानं पदार्थं च प्रकाशयति दीपवत् ॥ १० ॥ य आकाशे शरीरे च दृषत्स्वप्सु लतासु च । पांसुष्वद्रिषु वातेषु पातालेषु च संस्थितः ॥ ११ ॥ यः प्लावयति संरब्धं पुर्यष्टकमितस्ततः । येन मूकीकृता मूढाः शिला ध्यानमिवास्थिताः ॥ १२ ॥ व्योम येन कृतं शून्यं शैला येन घनीकृताः । आपो द्रुताः कृता येन दीपो यस्य वशो रविः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे नदी, नाले आदि का जल महासागर में ही गिरता है, वैसे ही सम्पूर्ण दृश्य पदार्थ प्रलय द्वारा जिसमें विलीन हो जाते हैं, जो दीपक की नाई अपना और अपने में कल्पित अन्यान्य पदार्थो का प्रकाशक हे । जो आकाश में, नाना शरीरो में, पत्थरों में, जल में, लताओं में, धूलिकणो में, पर्वतो में, वायु में और पाताल में स्थित है । जो अपने व्यापार में उद्यत पुर्यष्टक को (कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, भूतमात्रा, प्राण, अविद्या, काम, कर्म ओर अन्तःकरण को) बाहर-भीतर अपने चैतन्य की व्याप्ति से चैतन्य- युक्त करता है ओर जिससे मूक की गई जड़ शिलाएँ मानों ध्यान में बैठी हैं चेतनो की चेतना में वही कारण है एवं अचेतनो की विचित्रतामें भी वही हेतु हे, यह भाव हे । आकाश को जिसने शून्य बना रक्खा हे, पर्वतो को जिसने ठोस रूप दिया है, जल को जिसने तरल बना रक्खाहे ओर जिसने अपने वशीभूत सूर्य को दीपक (प्रकाशक) बना रक्खा है