Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 5, Verses 19–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 5, verses 19–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 19-21
संस्कृत श्लोक
प्रशान्ते चिद्धने यस्मिस्फुरन्त्यमृतवर्षिणि ।
धाराजलानि भूतानि सृष्टयस्तडितः स्फुटाः ॥ १९ ॥
चमत्कुर्वन्ति वस्तूनि यदालोकतया मिथः ।
असज्जातमसद्येन येन सत्सत्त्वमागतम् ॥ २० ॥
चलतीदमनिच्छस्य कायो यो यस्य संनिधौ ।
जडं परमरक्तस्य शान्तमात्मनि तिष्ठतः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे वृष्टि करनेवाले
गम्भीर मेघ में मूसलाधार जलवृष्टि ओर प्रकाशमय बिजली स्फुरित होती है वैसे ही जिस
आनन्दवर्षी शान्त ओर चिद्घन में जड पाँच भूत और चेतन विविध सृष्टियाँ स्फुरित होती हँ ।
जिसके प्रकाश से सब पदार्थ परस्पर आश्चर्य जनक कार्य करते है, जिससे असत्पदार्थ असत्
हैं और सत् पदार्थ सत्त्व को प्राप्त हुआ। जो देवता, मनुष्य पशु, पक्षी आदि स्वरूप है, असंग
ओर अनिच्छावाले अतएव शान्त भाव से अपनी आत्मा में स्थित जिसकी संनिधि में यह
दुश्यवर्ग अत्यन्त जड़ होता हुआ भी क्रियावान् हे