Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 3–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 50, verses 3–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 3-6
संस्कृत श्लोक
अथ योऽसौ शरस्तेन वैष्णवास्त्राभिमन्त्रितः ।
मुक्तस्तस्य फलप्रान्तादुल्मुका दिवि निर्ययौ ॥ ३ ॥
पङ्क्तयः स्फारचक्राणां शतार्कीकृतदिक्तटाः ।
गदानामभियान्तीनां शतवंशीकृताम्बराः ॥ ४ ॥
वज्राणां शतधाराणां तृणराजीकृताम्बराः ।
पट्टिशानां सपद्मानां दीनवृक्षीकृताम्बराः ॥ ५ ॥
शराणां शितधाराणां पुष्पजालीकृताम्बराः ।
खङ्गानां श्यामलाङ्गानां पत्रराशीकृताम्बराः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा सिन्धु ने वैष्णव अस्त्र से अभिमन्त्रित कर
जो शर अपनी प्रत्यंचा से छोडा उसके फल के अग्रभागसे उल्मूक (उल्का) आदि निकलने
लगे। उससे निकली हुई बड़े, बड़े चक्रों की पंक्तियों ने दिशाओं को सैकड़ों सूर्यो से युक्त सा
बना दिया, अभिमुख आ रही गदाओं की पंक्तियों ने आकाश को सैकड़ों गदाकार बाँस के नये
अँकुरों (पौधों) से युक्त कर दिया, सौ धारवाले वजो की पंक्तियों ने आकाश को तिनकों के
समूह से व्याप्त बना दिया, कमलदलों के कलियों के आकार की अनेक शाखाओं से युक्त
पट्टिशों की पंक्तियों ने आकाश को कटे हुए वृक्षों से व्याप्त सा कर दिया, चोखी धारवाले
बाणों की पंक्तियों ने आकाश को फूलों की जाली से युक्त सा कर दिया और काली आकृतिवाले
खगो की कतारों ने आकाश को पत्तों की राशि से व्याप्त कर दिया