Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 52, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
एवमारम्भघनयोरपि मण्डपयोस्तयोः ।
उदरे शून्यमाकाशमेवास्ति न जगद्भ्रमः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
मण्डप के अन्तर्गत आकाश में भी जब जगत् नहीं है, तब शुद्ध चिदाकाश मे जगत् नहीं है,
इसमें तो कहना ही क्या है ? इस आशय से कहते हैं।
इस प्रकार अनेक व्यापारों से पूर्ण प्रतीत होनेवाले उन मण्डपों के भी अन्दर शून्य आकाश
ही है, जगद्भ्रम नहीं है