Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 52, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सर्वं शून्यात्मविज्ञानं मेर्वादिगिरिजालकम् ।
नेदं कुड्यमयं किंचिद्यथा स्वप्ने महापुरम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अनुमान प्रमाण से भी उक्त बात को सिद्ध करते हैं।
मेरू आदि पर्वतों के समुदाय से युक्त वह सम्पूर्ण दृश्य निराकार ज्ञानरूप ही है, यह जैसा
दिखाई देता है, वैसा स्थूलरूप नहीं है, क्योंकि उसका जहाँ पर समावेश नहीं हो सकता,
अत्यन्त अल्प प्रदेश में तत्त्वज्ञों को उसकी प्रतीति हुई है, जैसे देह के अन्दर स्वप्न में देखा
गया महानगर