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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 52, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

जगन्ति सुबहून्येव संभवन्त्यणुकेऽपि च । कदलीपल्लवानीव संनिवेशेन भूरिशः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बहुत से केले के कोमल पत्ते तह के साथ अल्प स्थान में संनिविष्ट रहते हैं, वैसे ही अत्यन्त सूक्ष्म चैतन्य में अनन्त जगत्‌ रह सकते हैं