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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verses 31–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 52, verses 31–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 31-36

संस्कृत श्लोक

एवमेषा त्वमेषा च संपन्नैवमसौ नृपः । अहं चात्मनि सत्यत्वं गता सर्वतयात्मनः ॥ ३१ ॥ इमे वयमिहान्योन्यं संपन्नाश्चोदिता इति । इत्थं सर्वात्मकतया महाचिद्धनसंस्थितेः ॥ ३२ ॥ एवमेषा स्थिता राज्ञी हारिहासविलासिनी । लीला विलोलवदना नवयौवनशालिनी ॥ ३३ ॥ पेशलाचारमधुरा मधुरोदारभाषिणी । कोकिलास्वरसंकाशा मदमन्मथमन्थरा ॥ ३४ ॥ असितोत्पलपत्राक्षी वृत्तपीनपयोधरा । कान्ता काञ्चनगौराङ्गी पक्वबिम्बफलाधरा ॥ ३५ ॥ त्वत्संकल्पात्मकस्यैषा यदा भर्तुर्मनःकला । तदा त्वत्सदृशाकारा स्थितैषा चिच्चमत्कृतौ ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार यह (लीला), तुम, यह संसार स्थिति ओर यह राजा ये सब भ्रान्तिरूप ही हुए हैं, आत्मा की पूर्णता होने से केवल मैं आत्मा सत्यता को प्राप्त हूँ। ये राजा लोग और हम परस्पर अनुग्राह्य और अनुग्राहकरूप से परिचलित होकर इस प्रकार महाचिद्घन की मिथ्या कल्पना स्थिति से बन गये हैं, वैसे ही यह लीलारूप रानी बन गई हे, क्योकि महाचिद्घन (परम चेतन) की स्थिति सर्वात्मक है। यह लीला, जो कि मनोहर हासरूपी विलास से अलंकृत है, हावभावरूप लीला से चंचल मुँह से युक्त है, नव यौनव से सुशोभित है, बडी दक्ष, सुन्दर आचरणों से मन को लुभानेवाली, मीठे और अनमोल वचन बोलनेवाली, कोकिला के सुर के सदृश सुन्दर सुरवाली, यौवन मद से मन्दगति, नीले कमल की पंखुड़ियाँ के तुल्य विशाल नेत्रवाली, गोल ओर विशाल छाती से युक्त, सोने के सदृश गोरे अंगोंवाली, पके हुए बिम्बफल के सदुश लाल ओठवाली और बड़ी रमणीय हे, तुम्हारे संकल्परूप पद्म की जब मनोवृत्ति से उसकी वासना हुई, तब तुम्हारे सदुश आकारवाली यह चैतन्य रूप चमत्कार में स्थित हो गई