Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 52, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
इत्थं त्वां दृष्टवानेष दृष्टश्चैव त्वयेति च ।
त्वमप्यात्मनि संपन्ना सर्वगत्वाच्चिदात्मनः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार इस
राजा ने तुमको अपनी वासनारूप ही देखा और तुमने राजा को अपनी वासनामय ही देखा ।
तुम भी आत्मा में पहले जैसे तीन ब्रह्माण्डों की ब्रह्म में स्थिति दर्शाई है, वैसे ही स्थित हो,
क्योंकि आत्मा सर्वत्र व्यापक है यानी सब वासनाओं में व्याप्त है, इसलिए ब्रह्म का सर्वाकार
विवर्त उत्पन्न होता है