Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verses 50–51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 52, verses 50–51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 50,51

संस्कृत श्लोक

अथास्या जीवको देहात्प्राणमारुतरूपधृक् । मनसा चलतां प्राप्तो मुखाग्रत्यक्तदेहकः ॥ ५० ॥ ततो मरणमूर्च्छान्ते गृहेऽस्मिन्नेव चैतया । बुद्धौ भावित आकाशे दृष्टो जीवात्मना ततः ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले यह कैसे प्राप्त हुई इसका उत्तर देकर अब यह देहधारिणी कैसे हुई ? इस अंश का उत्तर देती है । वासनामय इस लीला के देह से निकलने की इच्छावाले अंगुष्ठपरिमाण वाले जीवने प्राणवायु का रूप धारण किया (५५) तदनन्तर मन से तत्‌ तत्‌ पदार्थों की प्राप्ति के लिए उत्सुक होकर नाडीमार्ग से देहका परित्याग किया यानी “तस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा” (उसके हृदयका अग्रभाग प्र्योतित (प्रकाशित) होता है, उस आत्मज्योतिरूप प्रद्योतन से यह आत्मा नेत्रो से, सिर से अथवा अन्यान्य शरीरभागों से निकलता है) इस श्रुति में कहे गये क्रम से नाडीमार्ग द्वारा देह का परित्याग किया | तदनन्तर वासना के कारण पूर्वजन्म के स्मरण से मरणमूर्छा के बाद जीवरूप से स्थित इस लीला ने इसी (ब्रह्माकाश या भूताकाशरूप) घर में बुद्धि में संकल्पित आगे कहे जानेवाले शरीर मेँ गमन ओर कुमारीरूप प्राप्ति आदि पदार्थ देखे