Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 53, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
हिमशैत्यं यथान्तस्थं कुम्भेऽभिन्ने बहिर्भवेत् ।
तथा संकल्पसिद्धा सा ब्रह्माण्डान्निर्गता बहिः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे घड़े के भीतर रक्खे
हुए हिमजल की शीतलता घड़े के फूटे बिना भी बाहर निकल आती है, वैसे ही वासनामयी वह
लीला भी ब्रह्माण्ड से बाहर निकल गई