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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verses 12–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 53, verses 12–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 12-14

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मादिस्थानमाक्रम्य प्राप्य ब्रह्माण्डखर्परम् । ततो ब्रह्माण्डपारस्था जलाद्यावरणानि च ॥ १२ ॥ समुल्लङ्घ्य पुरः प्राप महाचिद्गगनान्तरम् । अदृष्टपारपर्यन्तमतिवेगेन धावता । सर्वतो गरुडेनापि कल्पकोटिशतैरपि ॥ १३ ॥ तत्र ब्रह्माण्डलक्षाणि सन्त्यसंख्यानि भूरिशः । तान्यन्योन्यमदृष्टानि फलानीव महावने ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा आदि के लोकों को लाँघकर ब्रह्माण्ड के कपाल में पहुँचकर तदुपरान्त ब्रह्माण्ड के पार पहुँची हुई लीला जल आदिरूप आवरणों को पारकर अपार मायासंवलित चिदाकाश के मध्य में पहुँची । वह इतना विशाल है कि यदि गरूड अत्यन्त वेग से सदा उडते रहें तो वे भी सैकड़ों करोड कल्पोमें उसके ओर-छोर का पता नहीं लगा सकते तो, ओरों की बात ही क्या है ? उसमें लाखों ब्रह्माण्ड लाखों क्या असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, वे ऐसे ही हँ जेसे महान्‌ वन में असंख्य फल होते हैं, उन ब्रह्माण्डं न भी आपस में एक दूसरे को कभी नहीं देखा