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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verses 21–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 53, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

अहं देव्याः प्रसादेन सशरीरैवमीदृशम् । इह प्राप्तवती धन्या मत्समा नास्ति काचन ॥ २१ ॥ इति संचिन्त्य सा हस्ते गृहीत्वा चारु चामरम् । वीजयामास चन्द्रेण द्यीरिवावनिमण्डलम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं श्रीदेवीजी के वरदानरूप प्रसाद से सदेह ही (अपने प्राक्तन स्थूल देह से युक्त ही) इस प्रकार यहाँ पर आई हुई हूँ । मैं बड़ी धन्य हूँ, मेरे समान दूसरी कोई भी भाग्यशालिनी नहीं है, ऐसा विचारकर अपने हाथ में सुन्दर चँवर लेकर लीला जैसे द्युलोक चन्द्र से भूमिमण्डल को पंखा झलता है वैसे ही, झलने लगी यानी अपने पति के ऊपर चँवर डुलाने लगी