Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 68
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 68
संस्कृत श्लोक
पुरुषश्चेतनामात्रं स कदा क्वेव नश्यति ।
चेतनव्यतिरिक्तत्वे वदान्यत्किं पुमान्भवेत् ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
चेतन की अमरणस्वभावता का युक्ति से उपपादन करते हैं।
चेतनामात्र ही तो पुरुष हे, वह कब और कहाँ नष्ट हो सकता है ? यदि पुरुष को चेतन से
अतिरिक्त मानो, तो बताओ क्या देह पुरुष होगा या प्राण पुरूष होगा या इन्द्र्यो पुरुष होगी
अथवा मन पुरुष होगा या बुद्धि, अहंकार, चित्त पुरूष होंगे या उनके अधिष्ठाता देवता पुरूष
होंगे अथवा अविद्या पुरूष होगी ? इन सभी पक्षों में पुरुषरूप से माने गये देह आदि जड़ों द्वारा
चेतनरूप पुरुष से जन्य प्रकाश से होनेवाले सम्पूर्ण व्यवहार न हो सकेंगे । अतएव चेतनामात्र
ही पुरुष है, यह पक्ष अटल रहा